
आम ज़माने सा - समझ लिया मुझे भी
खैर, देर ही सही,
शुक्र है - बख्श दिया..
उनकी समझ अधूरी सही..!
तोड़ दिया मेरी गफलत को..
टूटा आईना दिखाया हमें..
टुकड़ों में ही सही,
हमने पहचान लिया खुद को..
होना था कभी - अभी से वो दूरी सही..!
जिंदगी की
सबसे बड़ी भूल हैं वो..
उम्मीद की हमनेफिर भी अपने उसूलों के खिलाफ..
माना ये मजबूरी सही.!
खुद को संभाला करेंगे..
फकीरों की तरह उनसे,
अब न कुछ भी माँगा करेंगे..
है मुश्किल मगर, कर लेंगे सब्र
अपनी तमन्नाओं से..
मेरी अधूरी जिंदगी की
तमन्ना एक अधूरी सही..!
6 टिप्पणियां:
tamanna jald poori ho...aamen
शुक्रिया सुरेन्द्र सर ......!
शुक्रिया यशवंत सर .....!
सुंदर अभिव्यक्ति ....
तमन्नाएं खुद ही पूरी करनी होती हैं ...
अच्छी अभिव्यक्ति है ...
सुंदर रचना -----आभार
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