अब आये हो ..!..
काका और फूफा भी ..
क्यूँ आये हो..?
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साभार : गूगल चित्र |
तुम्हें तो आना ही था
मूक मान्यता जो है हमारे मजहब में
जीते जी ना मिलो
मय्यत पे जरूर शामिल होना...
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खैर, आये हो तो ठीक है
थोडा तुम भी रो लो
मेरे तो आंसू सुख गए रोते-रोते
कल ही दम तोडा है मां ने
देखो न कितने कम आंसू
बचे थे मेरी आँखों में
कि आज रस्म निभाने को भी
आंसूं नहीं बचे
तुम्हारे तो बहुत आंसू
आ सकते हैं आँखों से - रो..लो..
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अरे..हाँ.. भूल गया..
कल ही तो जिक्र किया था मां ने तुम्हारा
बोल रही थी - बड़ी मुश्किलों में रहता है वो
देखने की भी फुर्सत
नहीं मिलती उसे..
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उसे क्या मालूम था -
आज के दिन के लिए
तूने वर्षों से छुट्टी ले रखी थी..
सिर्फ माँ के तड़प-तड़प कर
जीवित रहने तक ही
फुर्सत को तुम्हारे लिए
फुर्सत ना थी..
7 टिप्पणियां:
निःशब्द कर गए भाव
गहरी पीड़ा !
बहुत-बहुत शुक्रिया रश्मि प्रभा जी.. आपकी टिपण्णी हमारी सोच को नयी ऊर्जा प्रदान करती हैं.. लेखनी में हम आपको अपना वर्तमान लेखक-लेखिकाओं में आदर्श भी मानते हैं....!
बहुत-बहुत शुक्रिया सियारमण जी.. आप हमारे ब्लॉग पर आये.. अपनी महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति प्रदान की.. बहुत-बहुत शुक्रिया ..
बहुत मार्मिक...
धनंयवाद कैलाश शर्मा जी..
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