क्या बुरा होता ?

दिल मेरा नर्म 
और मासूम नादानों सी 
तो कहो..
कोई  कसूर मेरा ?
प्यार किया तुझे  तो
जुर्म किया ?
प्रेम तो खुदा भी करता है
मैंने किया तो क़त्ल किया  ? 
बताओ...
क्या मैं खुश रहूँ 
तो कोई अपराध,
हसना क्या गुनाह  मेरी खातिर  ?
बहुत सी कहानिया
सच हुई इस जहाँ में 
हम एक कहानी बनाते 
तो  क्या  क़यामत आती ?
लाखों  एक हुए हैं
एक दुसरे से जुदा होकर भी
हम संगम बन पाते
तो  नदियाँ बहना भूल जाती  ?
क्या सूरज न दीखता
या हवाएं गुम हो जाती ?
हम तो हैरान हैं
क्यूँ चाहत की हमने तुम्हारी
क्या बुरा होता ?
मुझे असीमित खुशियाँ मिल पाती
मेरी जो तुम हो जाती ????

 

3 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

bahut hi achhi rachna

संजय भास्कर ने कहा…

आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को |

कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Anil Avtaar ने कहा…

Rashmi Ji..
Bhaskar Ji..

Bahut-bahut dhanyawaad aapka... Aap ki preranaon se humein aseem oorja ki prapti hoti hai.. apni najar banayein rakhein..